आरज़ू ए दीदा ए यार में शब् की सेहर होने दो love shayari ,
आरज़ू ए दीदा ए यार में शब् की सेहर होने दो , दिल हुआ है धुंआ रूह फनाह होने दो ।
शाम बर्बाद जिसके कूचे में उसे खबर भी नहीं , रुख़्सत ए जान का चर्चा ज़मीन ओ आस्मां को होने दो ।।
जनाज़ा शानदार था मैय्यत किसी रईस की रही होगी , सुना है मरने वाले का बड़ा रुतबा था ।
खौफ ए खुदा में मर गया शायद इब्न ए इंसान था , मौत की दहशत तो रही होगी ।।
राख के ढेर में दबा है जो गुमान उसे भी था खुदा होने का , साडी औक़ात पता चलती है ख़ाक ए सुपुर्दगी के बाद ।
राजा रंक मलंग फ़कीर सभी मिलते हैं मिटटी में , सारा गरूर धरा रह जाता है मेहबूबा ए मौत से मिलने के बाद ।।
नज़र की जुम्बिश बातें हज़ार करती हैं , छुपा के लाख छुपाओ दमन साँसे सवाल करती हैं ।
जो अनकही सी दास्ताँ बिना हिले – डुले लबों ने बोल दी , दबी ज़बान में ज़्यादा बवाल करती हैं ।।
दरूं ए इश्क़ जन्नत की ख्वाहिश लेकर , दिल ए नादान फिर करता है गुज़ारिश सुकून ए रूह की फरमाइश लेकर ।
ज़िन्दगी दर बदर भटकती है आज़माइश बनकर , जाने किस सिम्त सिमट जाए ज़र्रा ए नवाज़िश बनकर ।।
ज़मीन से फलक तक हर कहकशां तेरा , ज़र्रा को आफताब करे हुस्न ओ शबाब तेरा ।
दीदा ए यार के तलबगार हम भी थे , अब ढूंढें नहीं मिलता है खुद की गलियों में नाम ओ निशाँ मेरा ।।
अब जान ले ले तू या ज़िन्दगी देदे , तेरे दम से मेरे दिल की दुनिया आबाद हुआ करती है ।
मुझे मेरे जाने का ग़म नहीं अब तो , बाद ए रुख़्सत के फ़िक्र ए यार में उम्र ए तबाह हुआ करती हैं ।।
रगों में बहता है लहू बनके इश्क़ तेरा , साद ओ ग़म से धड़कने आबाद हुआ करती हैं ।
कारोबार ए जहां से सरोकार नहीं है मुझको , नाम ए मेहबूब से साँसे गुलज़ार हुआ करती हैं ।।
हवा पर लिखता हूँ नाम उसका , दरुं ए इश्क़ का राज़दार वही है । नफ़स नफ़स का हिसाब रखता है , सरगोशियों का
तलबगार थोड़ी है ।।
मत कुरेद सोयी पड़ी रूहों को , न जाने ज़ख्म कब नासूर बन जाए ।
जिसे जन्नत समझता है दिल ए नादान , कब्रों का न कहीं कब्रिस्तान बन जाए ।।
कुछ कह रहा था दिल ख्याल ए यार में , सोचा विशाल ए यार तो अहमक मचल गया ।
वस्ल की रात सामने खड़ी थी गेसुओं से लिपटी , मौसम ए तपिश थी या हश्र ए हिज्र से डर गया ।।
रात शबनमी बात शबनमी, गुंचा ए गुल पर बिखरे अर्क की बूँदें शबनमी ।
इस बहार ए दिलनशीं में रुख़सार पर ज़ुल्फ़ें गिराए बैठा है , मिजाज़ ए यार खिज़ा खिज़ा क्यों है ।।
हटा दो चिलमन फरेब का मेरी पेशानी से नज़र आने दो माहताब ए हुस्न इस दीवाने को ।
बस उसी फ़िराक ए यार में हम भी हैं, जिसमे साहेब ए शहनवाज़ हुआ करते थे ।।
फूंक दिया अरमान नशेमन भी ख़ाक कर आये , दिल को बस तेरी मोहब्बतों से गुलज़ार किया है ।
दीदा ए यार की तलब दिल में लेकर , आशिक़ों ने कब ज़माने में कारोबार किया है ।।
चस्म ए बुल बुल फ़िज़ा में घुली पायलों की छम छम, नफ़स नफ़स में दिल की धड़कने थाम लेती है।
हवा के झोकों में तेरे गेसुओं की खुशबू , सरगोशियों से गुलशन गुल ए गुलज़ार किया करती है ।।
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